महापर्व छठ का दूसरा दिन: चार शुभ योगों में मनाया जाएगा खरना, जानें पूजा विधि और महत्व
Edited by Akshay prakash
धनबाद, 26 अक्टूबर 2025 — आज कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर महापर्व छठ पूजा का दूसरा दिन मनाया जा रहा है, जिसे खरना या लोहंडा कहा जाता है। यह दिन छठ के चार दिवसीय अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र दिन माना जाता है।
🌅 खरना का धार्मिक महत्व
छठ पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जबकि दूसरा दिन खरना के नाम से प्रसिद्ध है। खरना का अर्थ है — शुद्धिकरण और आत्मसंयम के माध्यम से आत्मशुद्धि का दिन।
इस दिन व्रती (उपवास करने वाले) पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करते और सूर्यास्त के बाद प्रसाद ग्रहण कर उपवास तोड़ते हैं। इसके बाद वे अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ करते हैं, जिसमें भोजन और पानी दोनों का त्याग किया जाता है।
🕉️ चार शुभ योगों का संयोग
इस वर्ष खरना के दिन चार अत्यंत शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस पर्व का महत्व और बढ़ गया है
1. सर्वार्थ सिद्धि योग: सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला योग।
2. रवि योग: सभी दोषों को दूर करने वाला शुभ समय।
3. शोभन योग: सौभाग्य, शांति और समृद्धि का प्रतीक।
4. नवपंचम राजयोग: गुरु और बुध के ज्योतिषीय संबंध से बनने वाला अत्यंत शुभ योग।
इन चार योगों में किया गया हर धार्मिक कार्य शुभ फलदायी माना गया है। पंचांग के अनुसार, पंचमी तिथि 27 अक्टूबर की सुबह 6 बजकर 4 मिनट तक रहेगी, जिसके बाद षष्ठी तिथि का आरंभ होगा।
🌼 खरना की पूजा विधि
खरना की पूजा शुद्धता और पवित्रता के साथ की जाती है।
व्रती सुबह स्नान कर घर या आंगन की मिट्टी से लिपाई-पुताई करते हैं। इसके बाद पूजा स्थल सजाया जाता है।
शाम को सूर्यास्त के बाद व्रती मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाते हैं, जिसमें मुख्य रूप से गुड़-चावल की खीर (रसियाव), रोटी या पूड़ी और केला शामिल होता है।
प्रसाद तैयार होने के बाद सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा की जाती है।
खरना का प्रसाद पहले देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है और फिर व्रती स्वयं ग्रहण करते हैं। प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत प्रारंभ हो जाता है।
🎶 खरना की शाम का दृश्य
खरना की शाम का वातावरण अद्भुत और भावनात्मक होता है।
हर घर से गुड़ की खीर की सुगंध आती है, महिलाएं पारंपरिक छठ गीत गाती हैं —
> “केलवा जे फरेला घवद से ओ पाताल चले जात हो रामा…”
बच्चे दीपक सजाते हैं, घर-आंगन रोशनी से भर जाता है।
यह शाम केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के एकता का भी प्रतीक है।
🙏 आस्था, अनुशासन और तपस्या का पर्व
छठ पूजा भारतीय संस्कृति के उन पर्वों में से है जो शुद्धता, तपस्या और भक्ति का संदेश देता है।
इसमें व्रती अपने मन, शरीर और आत्मा को पूरी तरह अनुशासित रखता है।
वह सूर्यदेव और छठी मैया से अपने परिवार की दीर्घायु, स्वास्थ्य, समृद्धि और उन्नति की कामना करता है।
खरना के साथ ही छठ पूजा का आध्यात्मिक पक्ष चरम पर पहुंच जाता है और अगला चरण होता है — संध्या अर्घ्य और फिर उषा अर्घ्य, जब लाखों श्रद्धालु जलाशयों में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
खरना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह आस्था, अनुशासन, पवित्रता और लोकसंस्कृति का संगम है।
इस दिन व्रती आत्मशुद्धि की साधना करता है और छठी मैया की कृपा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करता है।
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