42 साल पुरानी ‘मधुलिका स्वीट्स’ ने गिराए शटर, धनबाद की मिठास बनी अब यादें
Edited by Akshay prakash
धनबाद: कोयलांचल की पहचान और मिठास का पर्याय रही मधुलिका स्वीट्स ने आखिरकार अपने सभी शाखाओं पर ताला जड़ दिया। पूरे 42 वर्षों से रसगुल्ला, गुलाबजामुन और जलेबी के स्वाद से लोगों की ज़ुबान पर मिठास घोलने वाला यह नाम अब सिर्फ यादों में रह जाएगा।
धनबाद के हीरापुर, सरायढेला, बैंक मोड़, बरटांड़ और मेमको मोड़— इन पांच जगहों से संचालित मधुलिका स्वीट्स अब बंद हो चुका है। शुक्रवार को जब सभी शाखाओं के शटर एक साथ गिरे, तो शहरवासियों की आँखों में भी निराशा और भावनाओं की नमी साफ़ झलक गई।
प्रशासनिक दबाव और कानूनी कार्रवाई से टूटा हौसला
मधुलिका के संचालक जय प्रकाश चौरसिया ने भावुक स्वर में बताया कि “प्रशासनिक दबाव, लेबर डिपार्टमेंट की कार्रवाई और आंतरिक हालातों के कारण हमें यह कड़ा कदम उठाना पड़ा। दिल पर पत्थर रखकर मधुलिका को बंद करना पड़ा है।”
उन्होंने बताया कि—
लेबर डिपार्टमेंट ने स्किल्ड लेबर और अन्य मद जोड़कर छह माह का वेतन करीब 10 लाख रुपये निकाला और उस पर दस गुना जुर्माना, यानी लगभग 1 करोड़ रुपये का नोटिस थमा दिया।
नगर निगम ने मेमको मोड़ स्थित फैक्ट्री में जलापूर्ति कनेक्शन की गड़बड़ी बताते हुए 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।आठ लेन सड़क निर्माण के दौरान फैक्ट्री का जलापूर्ति सिस्टम प्रभावित हुआ था, जिसका खामियाज़ा भी उठाना पड़ा।
इन लगातार दबावों ने कारोबार को संभालना लगभग असंभव बना दिया।
पारिवारिक हालात ने भी डगमगाया कारोबार
जय प्रकाश चौरसिया ने यह भी बताया कि कारोबार के बंटवारे और पारिवारिक कारणों ने मधुलिका की नींव कमजोर की।
परिवार के पांच भाइयों में से चार के बेटे-बेटियां विदेश में नौकरी कर रहे हैं।
कारोबार संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ एक बेटे पर थी, जो पेशे से आईटी इंजीनियर है।
प्रशासनिक झंझट और कर्मचारियों की समस्याओं ने उसे भी थका दिया।
मधुलिका स्वीट्स का सालाना कारोबार लगभग 10 करोड़ रुपये था। इसके बावजूद नोटिस, जुर्माने और प्रशासनिक दबाव ने मालिक को मजबूर कर दिया।
जय प्रकाश चौरसिया ने कहा—
“मधुलिका सिर्फ कारोबार नहीं था, यह हमारा परिवार, हमारी पहचान और हमारी पीढ़ियों की मेहनत थी। लेकिन हालात के सामने हम हार गए।”
अब सिर्फ यादों में बचेगी मधुलिका की मिठास
धनबाद की गलियों में अब मधुलिका के रसगुल्ले की मुलायमियत, गुलाबजामुन की मिठास और जलेबी की करारी धुन नहीं मिलेगी। लेकिन इन स्वादों की यादें हमेशा शहरवासियों के दिलों में जिंदा रहेंगी।
लोग कह रहे हैं—
“मधुलिका सिर्फ एक मिठाई की दुकान नहीं थी, यह हमारी पीढ़ियों की यादें थी। अब यह नाम सुनकर सिर्फ नॉस्टैल्जिया बचेगा।”
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